देश का विकास(कविता)# लेखनी वार्षिक कविता प्रतियोगिता -07-Mar-2022
विषय - विकास (कविता वार्षिक प्रतियोगिता)
प्रदुषण का ज़हर
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देश के विकास की कीमत हम चुका रहे,
वायू में घुलते जहर को अब कब तक सहे।
वृक्षों को काट कर कारखाने लिए लगा,
इस विकास के युग में कोई न रहा सगा।
अपने ही अपनों के देखो दुश्मन बन चले,
इससे तो बेहतर थे हम सब गांव में ही भले।
प्रदुषण का ज़हर ले रहा कितनों की जान,
अब तो संभल जाओ, लो हमारी यह बात मान।
प्रदुषण पर करो रोक थाम,
कारखानों को न चलाओ सरेआम।
बस्ती से दूर ही हैं ये भले,
गली मोहल्ले में देखो ये न चले।
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कविता झा ' काव्या कवि'
रांची, झारखंड
#लेखनी
##लेखनी वार्षिक प्रतियोगिता
07.03.2022
Seema Priyadarshini sahay
07-Mar-2022 04:58 PM
बहुत ही खूबसूरत
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Punam verma
07-Mar-2022 09:33 AM
Very nice
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